Nios Deled Course 510 Assignment 1 Answer 2 with Question

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Nios Deled 510 Assignment 1 Answer 2 with Hindi Question : सिक्षको मैंने ये उत्त पूरे 500 शब्दों में दिया है आप चाहे तो इसे अपने शब्दों में लिखकर और बड़ा कर सकते है

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Nios Deled Course 510 Assignment 1 Answer 2 with Question
प्रश्न 2) निम्नलिखित दो शर्तो को एक वैज्ञानिक परिकल्पना को पूरा करना चाहिए | यह प्रमाणों के अनुरूप होनी चाहिए |
यह परिक्षण योग्य होनी चाहिए |
उपयुक्त उदहारण सहित उपरोक्त दोनों शर्तो की व्याख्या कीजिये |

उत्तर 2) प्रत्येक वस्तु कहा से आती है ? उसका क्या मतलब है ? अपने विश्व और प्रक्रति के नियम को समझने के लिए विज्ञानं हमें औजार देता है | विज्ञान सभी प्राकृतिक घटनाओ की जांच करता है | वैज्ञानिक विभिन्न तरीको से इन जांच प्रक्रियाओ तक पहुचते है | कुछ प्रयोगों पर आश्रित होते है, कुछ अवलोकनों पर, कुछ बंद-गली में पहुँच जाते है और कुछ अनापेछित (अचानक) खोज कर लेते है, कुछ तकनीकी विकास की ओर पहुचते है और कुछ स्थापित सिद्दांतो को शक के घेरे में ला खड़ा करते है | परन्तु इन सब विवधताओ के होते हुए भी, विज्ञान का उद्देश्य अपरिवर्तित रहता है - विश्व की क्रियाओ का सही और प्रभि स्पष्टीकरण |

इसके लिए आवशयकता है प्रमाण सहित विचारो का परिक्षण करने की ताकि वैज्ञानिक बहस हो सके | यहाँ पक्की बहस का तात्पर्य 'दो व्यक्तियों के बीच असहमति' नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य है 'प्रमाण आधारित तर्क' | सरल शब्दों में कहे तो वैज्ञानिक बहस किसी कोर्ट की सुनवाई की आखिरी बहस हो सकती है बजाय की दो प्रतिद्वन्दियो के मध्य लड़ाई | वैज्ञानिक बहस के तीन घटक है :

1. विचार - परिकल्पना 2. विचार से उपजा स्पष्टीकरण - अनुमान/भविष्यवाणी 3. अनुमानों से मेल खाता वास्तविक अवलोकन - प्रमाण

"यदि हम कहते है की सिगरेट पीने से फेफड़ो का कैंसर हो जाता है तो हम यह अनुमान लगा सकते है की जिन देशो में सिगरेट पीने वालो की संख्या अधिक अहि, वहां फेफड़ो के कैंसर की दर भी अधिक होगी |"


उदाहरण :
विचार पर गौर करे – “कोशिकाए जीवन की रचनात्मक इकाई है |” यदि यह विचार सही है तो हम सूक्ष्मदर्शी द्वारा सभी सजीब उतकों में कोशिकाए देखने की उम्मीद करेगे | तो ये प्रमाण (कोशिकाए दिखने का) इस विचार का समर्थन करेगे की सभी सजीव कोसिकाओ के बने होते है |

यह परिक्षण योग्य होनी चाहिए :

प्रतिमान केवल सिद्दांत ही नहीं है, बल्कि संपूर्ण विश्व दर्शन है जिसमे यह और इसके प्रभाव नजर आते है | कहुन ने अपनी पुस्तक “विज्ञान की सरंचना” में प्रतिमान बदलाव को एक वैज्ञानिक क्रांति कहा है | जब किसी वर्तमान प्रतिमान के खिलाफ बहुत महत्वपूर्ण अपवाद पैदा हो जाते है तो वह विज्ञान का विषय संकट के घेरे में आ जाता है | इस संकट में नए विचार (शायद कभी अस्वीकृत किये हुए) परखे जाते है | अंत में एक नया प्रतिमान स्थापित होता है | विज्ञान में, जो स्थाई और परिपक्व लगता है, प्रतिमान बदलाव काफी नाट्कीयढंग से आ सकता है | 19वीं शताब्दी में भौतिकी में ऐसा ही हुआ | उस समय लगता था की भौतिकी एक ऐसा विषय है जो मुख्या रूप से हल हो चुकी विश्व व्यवस्था की गुत्थियो में आखिरी विवरण भर रहा था |


विज्ञान के इतिहास व समाज विज्ञान में यह अपने आप ही एक बड़ा प्रतिमान परिवर्तन था इससे सम्बंधित कुछ सर्वोत्तम उदाहरण इस प्रकार है :

  • टोलेमेक ब्रह्मांडीकी से कॉपरनिकस ब्रह्मांडीकी तक ब्रह्मांडीकी में परिवर्तन |
  • ज्यामितीय प्रकाशिकी से भौतिकी प्रकाशिकी तक प्रकाशिकी में परिवर्तन |
  • अरस्तु की यांत्रिकी से क्लासिकी यांत्रिकी तक यांत्रिकी में परिवर्तन |

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